प्रधानमंत्री लगातार कर रहे हैं विदेशी मुद्रा बचाने की अपील 

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने एक बार पुनः भारतीय नागरिकों से आग्रह किया है कि वे आवश्यक नहीं हो तो सोना नहीं खरींदे अथवा कम मात्रा में खरीदें। साथ ही आपने यह भी अपील की है कि विदेशी पर्यटन को टालने का प्रयास करें एवं विदेश में जाकर शादी ब्याह के कार्यक्रम नहीं करें। यह समय की मांग है कि भारतीय नागरिक विदेशी मुद्रा को बचाने के उद्देश्य से स्वदेशी मंत्र को अपनायें। 

माननीय प्रधानमंत्री जी को देश के नागरिकों से उक्त आग्रह इसलिए करना पड़ा है क्योंकि वैश्विक स्तर पर परिस्थियां लगातार बिगड़ रही हैं। भारत चूंकि आर्थिक विकास के उस चक्र में आ गया है जहां छोटी सी चूक भी भारत में तेज गति से हो रहे आर्थिक विकास पर बहुत अधिक विपरीत प्रभाव डाल सकती है। इस कठिन दौर में भारत को बहुत संभल कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। रूस यूक्रेन युद्ध लम्बे समय से लगातार चल रहा है, इजराईल हम्मास युद्ध जारी ही था कि अमेरिका ईरान के बीच युद्ध छिड़ गया। उधर, अमेरिका में ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के साथ ही विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर टैरिफ की तलवार लगातार लटक रही है। वैश्विक स्तर पर इन विपरीत परिस्थितियों के बीच कई देशों के विदेशी व्यापार पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। इसमें भारत भी शामिल है, क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अन्य देशों से आयात करता है। इसी प्रकार, भारत देश में स्वर्ण की कुल मांग का भी 90 प्रतिशत से अधिक भाग आयात करता है। विशेष रूप से, अमेरिका ईरान के बीच छिड़े युद्ध के बाद स्ट्रेट ओफ होर्मुज से कच्चे तेल की आपूर्ति लगभग ठप्प पड़ गई है। भारत में होने वाले कच्चे तेल की कुल आपूर्ति का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से आता है। अतः भारत पर उक्त वर्णित परिस्थितियों का विशेष प्रभाव हुआ है। पिछले वर्ष भारत द्वारा 7,200 करोड़ अमेरिकी डॉलर का स्वर्ण आयात किया गया है, पिछले वर्ष की तुलना में यह 32 प्रतिशत अधिक है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्वर्ण की कीमतों में हुए तेज उछाल के चलते ही भारत के स्वर्ण आयात के बिल में 32 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है अन्यथा स्वर्ण आयात की मात्रा में कुछ कमी ही दर्ज हुई है। भारत के कुल आयात में कच्चे तेल के आयात की भागीदारी सबसे अधिक है, इसके बाद स्वर्ण के आयात की भागीदारी रहती है। इसके चलते भारत का विदेशी व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसे, यदि समय रहते नहीं सम्भाला गया तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव आने लगेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की कीमत और अधिक नीचे आने लगेगी।  

दूसरे, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से कई देशों में मुद्रा स्फीति की दर लगातार बढ़ रही है एवं इसके कारण एवं ब्याज दरों में वृद्धि के चलते इन देशों में बांड यील्ड भी लगातार बढ़ रही है। आज, विभिन्न देशों में बांड यील्ड पिछले कई वर्षों के उच्च स्तर पर आ गई है। जैसे, अमेरिका में 10 वर्षीय बांड यील्ड 4.80 प्रतिशत के उच्च स्तर से भी ऊपर पहुंच गई है, ब्रिटेन में 5.25 प्रतिशत (पिछले 18 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), फ्रान्स में 4.24 प्रतिशत (पिछले 17 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), जर्मनी में 3.37 प्रतिशत (पिछले 15 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), जापान में 2.99 प्रतिशत जहां पर शून्य प्रतिशत हुआ करती थी (पिछले 30 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), कनाडा में 3.75 प्रतिशत, ब्राजील में 14.56 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया में 5.23 प्रतिशत, सिंगापुर में 2.40 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया में 4.41 प्रतिशत एवं  भारत में 6.98 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। यदि विकसित देशों में यदि मुद्रा स्फीति की दर और अधिक बढ़ती है तो इसे नियंत्रण में लाने के उद्देश्य से ब्याज की दरों को बढ़ाया जा सकता है इससे इन देशों में बांड यील्ड और अधिक बढ़ेंगी, जिसके चलते भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से विदेशी मुद्रा में किए गए निवेश की निकासी होगी और यह राशि विकसित देशों में हस्तांतरित होगी क्योंकि इन देशों में बांड यील्ड आकर्षक स्तर पर पहुंच गई है। इन परिस्थितियों के बीच यदि भारत से भी विदेशी मुद्रा निवेश की निकासी प्रारम्भ होती है तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव आएगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए के मूल्य में तेज गिरावट दृष्टिगोचर होगी जिससे भारत में आयात और अधिक महंगे होने लगेंगे, इस प्रकार भारत में आयातित मंहगाई की अतिरिक्त मार पड़ेगी। इस बढ़ी हुई मंहगाई को नियंत्रित करने के लिए भारत को भी मजबूर होकर ब्याज दरों में वृद्धि करना होगी। ब्याज दरों में वृद्धि का विपरीत प्रभाव देश की सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले बांड पर अदा की जाने वाली ब्याज की राशि पर भी पड़ता है, इससे सरकारों को अपने बजट में से और अधिक राशि के भुगतान का प्रावधान ब्याज के रूप में करना होता है और अपने पूंजीगत खर्चों एवं जनता की भलाई के लिए चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर पर खर्च की जाने वाली राशि में कटौती करनी होती है। लम्बे समय तक चलने वाले अधिक ब्याज दर के साइकल से देश में मंदी की आशंका भी बढ़ती है। विकसित देश आज इस समस्या से झूझते हुए दिखाई दे रहे हैं। भारत को इस दबाव से बचाने की आवश्यकता है।      

तीसरे, भारत के पास आज 75,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। जापान के पास 1.2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं चीन के पास 3.4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार उपलब्ध है। भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर तक ले जाना चाहता है क्योंकि इससे भारत को भविष्य में विदेशी व्यापार में होने वाली किसी भी प्रकार की परेशानी से बचाया जा सकेगा। यह तभी सम्भव हो सकेगा, जब भारतीय नागरिक विदेशी मुद्रा का सोच समझकर उपयोग करें। स्वर्ण की खरीद से, विदेश में पर्यटन करने से एवं विदेश में शादियों के कार्यक्रम आयोजित करने से विदेशी मुद्रा का खर्च बढ़ता है जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार कम होते हैं। 

चौथे, भारतीय नागरिकों में स्वर्ण के प्रति आकर्षण कुछ अधिक मात्रा में ही है। यह सही है कि स्वर्ण भविष्य में आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता हुआ दिखाई देता है परंतु देश के विकास की दृष्टि से यह सुप्त मुद्रा के रूप में ही देखा जाता है। स्वर्ण में किए गए निवेश पर किसी भी प्रकार की आय का अर्जन नहीं होता है क्योंकि स्वर्ण में निवेश की गई राशि उत्पादक निवेश की श्रेणी में नहीं गिनी जाती है। एक अनुमान के अनुसार भारतीय परिवारों के पास लगभग 25,000 टन से अधिक का स्वर्ण भंडार मौजूद है, जिसकी बाजार कीमत लगभग 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 125 प्रतिशत है। इतनी भारी भरकम राशि का निवेश निष्क्रिय एवं अनुत्पादक अस्तियों में होने के चलते लाखों करोड़ रुपए की राशि पर किसी प्रकार की आय का अर्जन नहीं हो रहा है। यदि इसी निवेश को उत्पादक कार्यों में लगाया जाय तो देश की अर्थव्यवस्था को और अधिक गतिशील एवं प्रभावशाली बनाया जा सकता है। अतः भारत में यह लगातार प्रयास किया जा रहा है कि निवेश को अनुत्पादक अस्तियों में घटा कर उत्पादक अस्तियों में लगाया जाय। 

अतः अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उक्त वर्णित विपरीत परिस्थितियों के बीच भारत के प्रधानमंत्री, भारतीय नागरिकों से उक्त तीन आग्रह लगातार कर रहे हैं ताकि भारत की आर्थिक विकास दर को अक्षुण बनाए रखा जा सके, भारत में किए गए विदेशी मुद्रा के निवेश को भारत से बाहर निकलने से रोका जा सके एवं भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को और अधिक मजबूत बनाया जा सके ताकि भारत को भविष्य में विदेशी व्यापार में आने वाली किसी भी परेशानी से बचाया जा सके।