क्या उद्यमिता राष्ट्र निर्माण का माध्यम है
भारत में प्राचीन काल से यह व्यवस्था रही है कि परिवार के पारंपरिक व्यापार एवं व्यवसाय को पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार के सदस्य ही सफलतापूर्वक आगे बढ़ाने का काम करते रहे हैं। इस प्रथा से परिवार के सदस्यों के बीच उद्यमिता का विकास सहज रूप से होता रहा है क्योंकि नवीन पीढ़ी के युवा सदस्य बचपन से ही अपने पारम्परिक व्यवसाय में संलग्न हो जाते रहे हैं, इससे उस व्यवसाय में नवोनमेष विकसित करने के कई अवसर भी उपलब्ध होते रहे हैं। इस दृष्टि से, उद्यमिता तो भारतीय मूल के नागरिकों के डीएनए में शामिल रही है। भारतीय नागरिकों में उद्यमिता का भाव कूट कूट कर भरे रहने के चलते ही भारत प्राचीन काल में विश्व गुरु रहा है। और, आज एक बार पुनः भारत को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में शामिल करने का मार्ग नागरिकों में उद्यमिता की भावना जागृत करने में ही दिखाई दे रहा है। प्राचीन काल में भारत में नौकरी करने वाले नागरिकों को हेय दृष्टि से देखा जाता था अतः प्रत्येक नागरिक अपना स्वयं का व्यवसाय करने को प्रेरित होता था और उद्यमी बन जाता था। इसके चलते प्राचीन काल में भारत में बेरोजगारी की समस्या संभवत: कभी रही ही नहीं है। ग्रामीण इलाकों में भी नागरिक छोटे मोटे स्तर पर अपना व्यवसाय ही करते रहे हैं और उद्यमी की श्रेणी में गिने जाने में गर्व का अनुभव करते रहे हैं। परंतु, वर्तमान भारत में स्थितियां तेजी से बदली हैं एवं आज लगभग प्रत्येक युवा नागरिक केवल नौकरी करने की ओर आकर्षित होता हुआ दिखाई दे रहा है, क्योंकि अंग्रेजों के शासनकाल में शिक्षा व्यवस्था ही इस प्रकार की बना दी गई थी कि प्रत्येक युवा अपनी शिक्षा समाप्ति के पश्चात केवल आकर्षक नौकरी प्राप्त करने की ओर लालायित रहता था। अंग्रेजों को अपने शासन काल में दरअसल अपने प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए “क्लर्क” वर्ग की अधिक आवश्यकता थी, अतः उन्होंने भारत के युवाओं में उद्यमिता के मूल विचार को दबा कर उनमें केवल क्लर्क बनने के भाव को प्रफुल्लित किया था।
आज भारत की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। प्रत्येक युवा नागरिक एवं जनसामान्य में उद्यमिता की संस्कृति को विकसित करने की आज महती आवश्यकता है। पिरामिड के निचले स्तर पर मौजूद युवाओं को सशक्त बनाकर भारत के लिए उद्यमिता की ओर ध्यान केंद्रित करके, अपने जनसांख्यकीय लाभांश के माध्यम से देश के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में सशक्त परिवर्तन करते हुए भारत में आज इसके माध्यम से समावेशी और समुत्थानशील विकास किया जा सकता है। अतः उद्यमिता जन आंदोलन को गति देना ही भारत के विकास की गाथा का अगला कदम होना चाहिए।
अंग्रेजों द्वारा लागू की गई शिक्षा पद्धति के चलते भारत के युवाओं की मानसिकता केवल नौकरी प्राप्त करने की हो गई है और वे उद्यमिता के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं। अतः आज भारत में युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पर्याप्त मात्रा में निर्मित नहीं हो पा रहे हैं। आज यदि देश में उद्यमिता को बढ़ावा नहीं दिया गया तो भारत में विशाल युवा आबादी लाभ के स्थान पर बोझ बन जाएगी। ड्राफ्ट नेशनल स्किल पॉलिसी 2025 के अनुसार, भारत में 11 करोड़ छात्र, 22 करोड़ युवा न तो रोजगार में हैं, न शिक्षा में और न ही किसी प्रशिक्षण में हैं। साथ ही, 2 करोड़ युवा नागरिक रोजगार की तलाश में हैं, यह आंकडें भारत में रोजगार के नए अवसर निर्मित करने की चुनौती की व्यापकता को दर्शाते हैं। इसी प्रकार, वर्ष 2020 में मिकेंजी द्वारा प्रस्तुत एक प्रतिवेदन के अनुसार, भारत को वर्ष 2030 तक गैर-कृषि क्षेत्र में 9 करोड़ रोजगार के नए अवसर निर्मित करने होंगे ताकि वर्तमान जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियों के अनुसार नए श्रमिकों को समाहित किया जा सके।
वर्तमान में भारत में उद्यमिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से कई प्रयास किए जा रहे हैं एवं इस संदर्भ में कई योजनाओं को लागू भी किया गया है। इन योजनाओं के सुखद परिणाम अब दिखाई देने भी लगे है। भारत में केंद्र सरकार द्वारा कौशल विकास योजना लागू की गई है, इससे युवा नागरिकों में उद्यमिता का भाव विकसित करने का कार्य कुछ आसान बन पड़ा है। भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम आज अमेरिका एवं युनाईटेड किंगडम के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा इकोसिस्टम बन गया है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार ने 55,200 स्टार्टअप को मान्यता प्रदान की है, इससे भारत में मान्यता प्राप्त कुल स्टार्टअप की संख्या बढ़कर 2.23 लाख हो गई है जिसमें 23.36 लाख युवाओं के लिए रोजगार के अवसर निर्मित हुए हैं। इन स्टार्टअप में उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाता है।
भारत में आज भी 60 प्रतिशत से अधिक नागरिक ग्रामीण इलाकों में निवास कर रहे हैं। अतः उद्यमिता विकास की अधिक आवश्यकता ग्रामीण इलाकों में हैं परंतु आर्थिक विकास एवं उद्यमिता परिवर्तन के केंद्र के रूप में महानगरीय क्षेत्र, मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, हैदराबाद, पुणे, आदि, अधिक तेजी से उभरे हैं। हालांकि, हाल ही के समय में छोटे शहरों पर भी इस दृष्टि से अधिक ध्यान दिया जा रहा है। वर्तमान में 51 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों में उभर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, असम और गुजरात जैसे राज्य विशेष स्टार्टअप एवं नवाचार नीतियां अपनाते हुए दिखाई दे रहे हैं। परंतु, आज ग्रामीण इलाकों में उद्यमिता केंद्रो को विकसित करने की अधिक आवश्यकता है। इस दृष्टि से, भारत में अब उद्यमशीलता की भावना केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि आज के युवा कृषक, कारीगर एवं स्वयं सहायता समूह के बीच भी उद्यमशीलता की भावना जागृत हो रही है। डीहाट, किसानकनेक्ट एवं लूप जैसे प्लैट्फार्म छोटे किसानों के लिए एग्री सप्लाई चैन का डिजिटलीकरण कर रहे हैं। भारत में गिग और क्रीएटिव अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, जहां देश में युवा नागरिक यूट्यूब एवं इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म के माध्यम से सामग्री, विशेषज्ञता और सेवाओं का व्यवसायीकरण कर रहे हैं। आज भारत में 20 से 25 लाख के बीच सक्रिय डिजिटल क्रीएटर कार्य कर रहे हैं। फिटनेस कोच, क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाने वाले शिक्षक और आर्टीफिशीयल इंटेलिजेन्स आधारित कंटेंट डिजाइनर जैसे व्यक्तिगत उद्यमियों की नई पीढ़ी व्यवसाय की परिभाषा को फिर से गढ़ रही है।
अंत में यह कहा जा सकता है वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र्र बनाने एवं मां भारती को पुनः विश्व गुरु के पद पर आरूढ़ करने के लिए भारतीय युवाओं को एक बार पुनः उद्यमिता के मार्ग पर ही चलना होगा।

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